
भारत की बहुप्रतीक्षित क्रिप्टो रिपोर्ट मानसून सत्र में होगी पेश, निवेशकों की नजर संसद पर
भारत की बहुप्रतीक्षित क्रिप्टो रिपोर्ट मानसून सत्र में संसद में पेश हो सकती है। जानिए रिपोर्ट में किन मुद्दों पर फोकस रहेगा और इसका निवेशकों व क्रिप्टो उद्योग पर क्या असर पड़ सकता है।

भारत में क्रिप्टोकरेंसी को लेकर लंबे समय से जारी अनिश्चितता जल्द कुछ हद तक दूर हो सकती है। संसद की स्थायी वित्त समिति की बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट आगामी मानसून सत्र में पेश किए जाने की तैयारी है। इस रिपोर्ट का शीर्षक "वर्चुअल डिजिटल परिसंपत्तियों पर अध्ययन और आगे की राह" है। माना जा रहा है कि यह दस्तावेज आने वाले समय में भारत की क्रिप्टो नीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
यह रिपोर्ट कई महीनों तक चली बैठकों और विभिन्न सरकारी संस्थानों, नियामकों तथा क्रिप्टो उद्योग के प्रतिनिधियों से हुई चर्चा के बाद तैयार की गई है। समिति ने देश और विदेश के प्रमुख क्रिप्टो एक्सचेंजों, वित्तीय खुफिया इकाइयों, कर अधिकारियों और अन्य सरकारी एजेंसियों से भी सुझाव लिए हैं।
हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी पहली बार सीधे समिति के सामने अपना पक्ष रखा। केंद्रीय बैंक ने दोहराया कि निजी क्रिप्टोकरेंसी को कानूनी मान्यता नहीं दी जानी चाहिए और बैंकों को क्रिप्टो तथा निजी स्टेबलकॉइन से अलग रखा जाना चाहिए।
रिपोर्ट में किन मुद्दों पर रहेगा फोकस?
जानकारी के अनुसार, रिपोर्ट में केवल क्रिप्टो निवेश ही नहीं बल्कि पूरे वर्चुअल डिजिटल परिसंपत्ति क्षेत्र पर सुझाव दिए जाएंगे। इसमें निवेशकों की सुरक्षा, कर व्यवस्था, नियामकीय ढांचा, एक्सचेंजों की जवाबदेही, धन शोधन रोकथाम और ब्लॉकचेन तकनीक के उपयोग जैसे विषय शामिल हो सकते हैं।
रिपोर्ट तैयार करने के दौरान समिति ने भारतीय और वैश्विक क्रिप्टो एक्सचेंजों के अलावा वित्त मंत्रालय, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT), वित्तीय खुफिया इकाई (FIU), कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय और अन्य संस्थानों से भी विचार-विमर्श किया। इसका उद्देश्य ऐसा ढांचा तैयार करना है जो निवेशकों की सुरक्षा और नवाचार के बीच संतुलन बना सके।
समिति की अंतिम बैठकों में आर्थिक मामलों के विभाग से भी राय ली जानी है। इसके बाद रिपोर्ट को अंतिम रूप देकर संसद के मानसून सत्र में पेश किया जाएगा।
RBI और उद्योग के बीच अलग-अलग सोच
क्रिप्टो नीति को लेकर सबसे बड़ा मतभेद RBI और उद्योग के बीच बना हुआ है। RBI का कहना है कि निजी क्रिप्टो परिसंपत्तियां वित्तीय स्थिरता, धन शोधन और अवैध लेनदेन जैसे जोखिम बढ़ा सकती हैं। इसी वजह से केंद्रीय बैंक बैंकों और अन्य विनियमित वित्तीय संस्थानों को इस क्षेत्र से दूर रखने की वकालत कर रहा है।
दूसरी ओर उद्योग से जुड़े संगठनों और कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्ण प्रतिबंध की बजाय स्पष्ट कानून और लाइसेंस आधारित नियमन अधिक प्रभावी रहेगा। उनका तर्क है कि भारत दुनिया के सबसे बड़े क्रिप्टो बाजारों में शामिल है और स्पष्ट नियम बनने से निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा तथा कारोबार देश के भीतर ही विकसित होगा।
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कुछ पेशेवर संस्थानों ने भी व्यापक कानून बनाने की वकालत की है, जिसमें डिजिटल परिसंपत्तियों के जारी होने, कारोबार, संरक्षण और लेखांकन से जुड़े स्पष्ट नियम शामिल हों।
निवेशकों के लिए क्या मायने रखती है यह रिपोर्ट?
फिलहाल भारत में क्रिप्टो निवेश पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन इसे कानूनी मुद्रा का दर्जा भी प्राप्त नहीं है। निवेशकों पर 30 प्रतिशत कर, 1 प्रतिशत टीडीएस और अन्य कर नियम पहले की तरह लागू हैं। ऐसे में निवेशकों को लंबे समय से स्पष्ट नियामकीय ढांचे का इंतजार है।
हालांकि यह रिपोर्ट खुद कोई नया कानून लागू नहीं करेगी, लेकिन इसकी सिफारिशें भविष्य में सरकार की नीति और संभावित विधेयक का आधार बन सकती हैं। यदि रिपोर्ट नियमन की दिशा में सुझाव देती है, तो उद्योग को नई उम्मीद मिल सकती है। वहीं यदि RBI के सुझावों को अधिक महत्व दिया जाता है, तो बैंकिंग क्षेत्र और क्रिप्टो के बीच दूरी और बढ़ सकती है।
आगे क्या होगा?
सरकार की ओर से अभी अंतिम नीति की घोषणा नहीं हुई है। लेकिन संसद की स्थायी वित्त समिति की यह रिपोर्ट भारत की क्रिप्टो यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव मानी जा रही है। इसके जरिए पहली बार विभिन्न सरकारी संस्थानों, नियामकों और उद्योग की राय को एक दस्तावेज में समेटा जाएगा।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि रिपोर्ट पेश होने के बाद यह साफ होने लगेगा कि भारत क्रिप्टो को लेकर किस दिशा में आगे बढ़ना चाहता है। क्या देश यूरोप की तरह नियमन आधारित मॉडल अपनाएगा, या फिर RBI की सतर्क नीति को प्राथमिकता मिलेगी, इसका संकेत इसी रिपोर्ट से मिल सकता है। फिलहाल करोड़ों भारतीय क्रिप्टो निवेशकों और उद्योग की नजर मानसून सत्र पर टिकी हुई है।
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