
भारत में क्रिप्टो विनियम पर फिर मंथन, Parliament की सुनवाई में उठे ये बड़े सवाल
भारत की संसद की वित्त समिति ने VDA और Crypto Regulation पर सरकार से जानकारी ली। जानिए 30% टैक्स, 1% TDS, Offshore Trading और Stablecoin को लेकर क्या बड़े सवाल उठे।

भारत में क्रिप्टोकरेंसी के भविष्य को लेकर लंबे समय से चल रही चर्चा एक बार फिर संसद तक पहुंची है। लोकसभा की वित्त संबंधी स्थायी समिति ने 16 सितंबर को Virtual Digital Assets यानी VDA पर वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग से जानकारी ली। यह करीब एक साल से चल रही समिति की समीक्षा प्रक्रिया का हिस्सा था, जिसमें RBI, टैक्स विभाग, क्रिप्टो एक्सचेंज और उद्योग से जुड़े पक्षों से भी जानकारी ली जा चुकी है।
इस बैठक में फिलहाल कोई नया कानून या क्रिप्टो नियम लागू नहीं हुआ है। समिति अब सरकार के लिखित जवाब का इंतजार कर रही है, जिसके बाद वह अपनी रिपोर्ट तैयार करके आगे भेजेगी। समिति के अध्यक्ष Bhartruhari Mahtab ने कहा कि क्रिप्टो को स्वीकार नहीं करने और उसे नियंत्रित भी नहीं करने की मौजूदा स्थिति कई सवाल खड़े कर रही है।
Crypto को किस तरह नियंत्रित किया जाए?
संसदीय समिति के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत में क्रिप्टोकरेंसी और दूसरे डिजिटल एसेट को कानूनी रूप से किस श्रेणी में रखा जाए। क्या इन्हें प्रतिभूति माना जाए, कमोडिटी के तौर पर देखा जाए या इनके लिए अलग श्रेणी बनाई जाए?
इस वर्गीकरण का सीधा असर नियमन पर पड़ेगा। इससे यह तय करने में मदद मिलेगी कि एक्सचेंज की निगरानी कौन करेगा, निवेशकों को किस तरह की सुरक्षा मिलेगी और डिजिटल एसेट से जुड़े कारोबार के लिए कौन से नियम लागू होंगे। फिलहाल भारत में ऐसा कोई व्यापक ढांचा मौजूद नहीं है।
हालांकि, क्रिप्टो पूरी तरह नियमों से बाहर भी नहीं है। VDA सेवा प्रदाताओं पर मनी लॉन्ड्रिंग रोधी कानून के तहत कुछ जिम्मेदारियां लागू हैं और उन्हें Financial Intelligence Unit India के साथ पंजीकरण करना होता है। सितंबर में FIU-IND ने 15 गैर-अनुपालन करने वाले VDA सेवा प्रदाताओं के खिलाफ कार्रवाई भी की थी।
30% टैक्स और 1% TDS के बीच Offshore Trading बड़ा मुद्दा
भारत में क्रिप्टो से होने वाले मुनाफे पर 30% टैक्स और कुछ VDA लेनदेन पर 1% TDS लागू है। लेकिन संसद की चर्चा में सिर्फ टैक्स दर ही मुद्दा नहीं है। भारतीय निवेशकों के Offshore Platforms की ओर जाने से सरकार के लिए निगरानी और टैक्स अनुपालन चुनौती बना हुआ है।
समिति की रिपोर्टिंग के दौरान Offshore Trading का बड़ा हिस्सा होने का अनुमान भी सामने आया है। इसका असर घरेलू एक्सचेंजों की गतिविधि और सरकार की निगरानी क्षमता पर पड़ सकता है। अगर भारतीय उपयोगकर्ता विदेशी प्लेटफॉर्म पर कारोबार करते हैं, तो लेनदेन की निगरानी और नियमों का पालन सुनिश्चित करना ज्यादा जटिल हो जाता है।
यही वजह है कि भविष्य के नियामकीय ढांचे में एक्सचेंज, कस्टडी, लेनदेन की निगरानी और निवेशक शिकायतों के समाधान जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
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RBI का रुख और Stablecoin की चुनौती
इस पूरी बहस में RBI का रुख भी अहम है। जुलाई में केंद्रीय बैंक ने संसदीय समिति के सामने कहा था कि Virtual Digital Assets भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम पैदा कर सकते हैं और इन्हें फिलहाल कानूनी मान्यता नहीं दी जानी चाहिए। RBI ने खास तौर पर अवैध गतिविधियों और वित्तीय स्थिरता से जुड़े जोखिमों पर चिंता जताई थी।
Stablecoin भी भविष्य के नियमन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं। USDT और USDC जैसे Stablecoin का इस्तेमाल सीमा पार भुगतान और पैसे भेजने में हो सकता है। ऐसे लेनदेन का संबंध विदेशी मुद्रा नियमों और वित्तीय निगरानी से भी जुड़ सकता है। इसलिए सरकार के सामने चुनौती सिर्फ Bitcoin या दूसरे टोकन को नियंत्रित करने की नहीं, बल्कि Stablecoin और उनसे जुड़े भुगतान ढांचे को लेकर भी है।
अभी क्या बदला और आगे क्या होगा?
फिलहाल आम निवेशकों और क्रिप्टो कंपनियों के लिए मौजूदा नियमों में कोई बदलाव नहीं हुआ है। 30% टैक्स, 1% TDS और FIU-IND के तहत मनी लॉन्ड्रिंग रोधी अनुपालन पहले की तरह लागू हैं। 16 सितंबर की सुनवाई मुख्य रूप से सरकार से जानकारी लेने और समिति की रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया का हिस्सा थी।
इससे पहले जुलाई में समिति ने व्यापक VDA नियामकीय ढांचे की जरूरत पर विचार करने और अंतरिम व्यवस्था के तौर पर निगरानी वाले Self-Regulatory Organisation की संभावना पर भी सुझाव दिया था। हालांकि यह अभी अंतिम सरकारी नीति नहीं है।
अब अगला महत्वपूर्ण कदम सरकार का लिखित जवाब और उसके बाद समिति की रिपोर्ट होगी। इसलिए भारत में क्रिप्टो के लिए नया कानून कब आएगा या नियमन किस रूप में होगा, इस पर अभी निश्चित समयसीमा नहीं है। फिलहाल संसद की प्रक्रिया यह संकेत जरूर देती है कि VDA को लेकर मौजूदा व्यवस्था और उसके खाली हिस्सों पर सरकार तथा नीति निर्माताओं की समीक्षा जारी है।
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