
30% Tax, 1% TDS फिर भी क्रिप्टो पर फिदा भारत, आखिर क्या है वजह?
30% Tax, 1% TDS और स्पष्ट नियमन की कमी के बावजूद भारत में क्रिप्टो निवेश की लोकप्रियता क्यों बढ़ रही है? जानिए युवा निवेशकों, छोटे शहरों और नए क्रिप्टो नियमों की पूरी कहानी।

भारत में क्रिप्टोकरेंसी को लेकर सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक यानी RBI का रुख लंबे समय से सावधानी भरा रहा है। इसके बावजूद देश में डिजिटल एसेट में निवेश करने वालों की संख्या लगातार बड़ी बनी हुई है। हालिया आंकड़े बताते हैं कि भारत में क्रिप्टो को लेकर दिलचस्पी केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि छोटे शहरों और युवा निवेशकों के बीच भी इसका आधार बढ़ रहा है।
Business Today की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, OECD की जून 2026 की रिपोर्ट में भारत को उन देशों में शामिल किया गया है जहां जून 2025 तक के 12 महीनों में क्रिप्टो एसेट में सबसे ज्यादा पूर्ण मात्रा में निवेश प्रवाह देखा गया। वहीं, CoinSwitch के अनुसार भारत में क्रिप्टो निवेशकों की संख्या करीब 7 करोड़ से 9 करोड़ के बीच हो सकती है, हालांकि सक्रिय निवेशकों की संख्या इससे काफी कम है।
छोटे शहरों से आ रहे हैं नए क्रिप्टो निवेशक
भारत में क्रिप्टो निवेश का स्वरूप पिछले कुछ वर्षों में काफी बदला है। अब यह केवल महानगरों के युवा ट्रेडर्स तक सीमित नहीं है। WazirX की 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, उसके 82% से ज्यादा उपयोगकर्ता गैर-महानगरीय शहरों से आते हैं। सामान्य निवेशक की उम्र करीब 34 साल बताई गई है।
CoinSwitch की दूसरी रिपोर्ट के अनुसार, 2026 की दूसरी तिमाही में भारत के करीब तीन-चौथाई क्रिप्टो निवेशक 35 साल से कम उम्र के थे। नए निवेशकों में 18 से 25 साल की उम्र वाले लोगों की हिस्सेदारी 54.4% रही। उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र इस बाजार के प्रमुख राज्यों में शामिल रहे।
Mudrex के अनुसार, वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के आधार पर वित्त वर्ष 2023 से वित्त वर्ष 2025 के बीच भारत में VDA लेनदेन का मूल्य $109,580 करोड़ के बराबर रहा और इस दौरान इसमें कुल 131% की वृद्धि दर्ज की गई। इससे पता चलता है कि कड़े नियमों के बावजूद डिजिटल एसेट बाजार में गतिविधि बनी हुई है।
30% Tax और 1% TDS ने बदला निवेश का तरीका
भारत में क्रिप्टो निवेशकों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक मौजूदा टैक्स व्यवस्था है। VDA से होने वाली आय पर 30% टैक्स लागू है। आय की गणना करते समय अधिग्रहण की लागत को छोड़कर दूसरे खर्चों की कटौती की अनुमति नहीं है। VDA में हुए नुकसान को दूसरी आय के साथ समायोजित करने की भी अनुमति नहीं है।
इसके अलावा, कई VDA लेनदेन पर 1% TDS लागू होता है। आयकर विभाग के मुताबिक कुछ मामलों में सालाना $10,000 और निर्दिष्ट व्यक्तियों के लिए $50,000 तक की सीमा लागू होती है।
इस व्यवस्था ने खास तौर पर बार-बार ट्रेड करने वाले निवेशकों को प्रभावित किया है। WazirX के संस्थापक निश्चल शेट्टी के अनुसार, 1% TDS लागू होने के बाद भारत के स्पॉट क्रिप्टो बाजार में ट्रेडिंग वॉल्यूम में भारी गिरावट आई। उनके मुताबिक 2022 में टैक्स व्यवस्था की घोषणा के बाद भारतीय बाजार के करीब 90% से 95% वॉल्यूम पर असर पड़ा था।
इसके बावजूद लंबी अवधि के निवेशक बाजार में बने हुए हैं। कई निवेशक अब लगातार ट्रेडिंग के बजाय Bitcoin, Ethereum और Solana जैसे बड़े डिजिटल एसेट को लंबे समय तक रखने की रणनीति अपना रहे हैं।
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नियमों की कमी के बावजूद क्रिप्टो की मांग क्यों?
भारत में क्रिप्टो की लोकप्रियता के पीछे केवल कीमत बढ़ने की उम्मीद ही वजह नहीं है। उद्योग से जुड़े लोगों के मुताबिक युवा निवेशक डिजिटल वित्तीय उत्पादों से ज्यादा सहज हैं और क्रिप्टो को वैश्विक तकनीकी अर्थव्यवस्था में भाग लेने के एक तरीके के रूप में देखते हैं।
इसके अलावा पोर्टफोलियो में अलग-अलग तरह की संपत्तियां रखने की सोच भी क्रिप्टो की मांग बढ़ा रही है। कुछ निवेशक ब्लॉकचेन तकनीक, विकेंद्रीकृत वित्त और दूसरे उपयोगों को भी इस बाजार की संभावनाओं का हिस्सा मानते हैं। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि क्रिप्टो बाजार में कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव होता है और शेयर बाजार की तरह यहां कई सुरक्षा व्यवस्थाएं मौजूद नहीं हैं।
Chainalysis की हालिया रिपोर्टिंग में भी भारत को क्रिप्टो अपनाने के मामले में प्रमुख बाजार बताया गया है। OECD भी भारत में व्यापक क्रिप्टो अपनाने की बात कहता है, जबकि RBI लगातार डिजिटल एसेट से जुड़े वित्तीय जोखिमों को लेकर चेतावनी देता रहा है।
भारत में क्रिप्टो विनियम का क्या होगा?
भारत में क्रिप्टो को लेकर सबसे बड़ा सवाल अभी भी स्पष्ट नियमन का है। फिलहाल सरकार क्रिप्टो पर टैक्स लगा रही है और एक्सचेंजों को Financial Intelligence Unit यानी FIU-IND के साथ पंजीकरण तथा मनी लॉन्ड्रिंग विरोधी नियमों का पालन करना पड़ता है। लेकिन क्रिप्टो को आधिकारिक मुद्रा या मान्यता प्राप्त परिसंपत्ति वर्ग का दर्जा नहीं मिला है।
वहीं, हाल में वित्त मंत्रालय ने संसदीय समिति के सामने क्रिप्टो के लिए अलग नियामकीय व्यवस्था बनाने को लेकर आपत्ति जताई है। मंत्रालय का तर्क है कि ऐसा करने से निवेशकों को सुरक्षा का गलत भरोसा मिल सकता है। दूसरी ओर, वित्त संबंधी संसदीय समिति ने VDA के लिए स्पष्ट परिभाषा और अंतरिम व्यवस्था के तौर पर मान्यता प्राप्त Self-Regulatory Organisations के इस्तेमाल का सुझाव दिया है।
इस बीच सरकार ने क्रिप्टो लेनदेन की निगरानी भी बढ़ाई है। आयकर कानून की धारा 285BAA, जो 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी हुई, के तहत निर्धारित रिपोर्टिंग संस्थाओं को क्रिप्टो एसेट से जुड़े लेनदेन की जानकारी तय प्रारूप में आयकर विभाग को देनी होगी।
यानी भारत में क्रिप्टो की कहानी फिलहाल एक विरोधाभासी तस्वीर दिखाती है। एक तरफ टैक्स, रिपोर्टिंग और नियामकीय अनिश्चितता है, तो दूसरी तरफ करोड़ों संभावित निवेशकों और युवाओं की बढ़ती दिलचस्पी। आने वाले समय में सरकार किस तरह का नियामकीय ढांचा तैयार करती है, यह तय करेगा कि भारत का क्रिप्टो बाजार इसी तरह आगे बढ़ता है या उसकी दिशा बदलती है।
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