
क्रिप्टो पर भारत का बड़ा दांव, संसद समिति ने नियमों की पहली रूपरेखा सुझाई
संसद की वित्त समिति ने भारत में क्रिप्टो के लिए अंतरिम नियामकीय ढांचे का सुझाव दिया है। जानिए SRO, निवेशक सुरक्षा, टोकनाइज्ड परिसंपत्तियों और नए नियमों पर क्या सिफारिशें की गई हैं।

भारत में क्रिप्टो परिसंपत्तियों को लेकर लंबे समय से जारी अनिश्चितता के बीच संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति ने एक अहम सुझाव दिया है। समिति का मानना है कि व्यापक कानून बनने तक सरकार को क्रिप्टो क्षेत्र के लिए एक अंतरिम नियामकीय ढांचा लागू करना चाहिए। इसका उद्देश्य तेजी से बढ़ते डिजिटल परिसंपत्ति बाजार में पारदर्शिता लाना, निवेशकों की सुरक्षा बढ़ाना और उद्योग के लिए न्यूनतम मानक तय करना है।
यह सिफारिश ऐसे समय आई है जब कुछ सप्ताह पहले भारतीय रिजर्व बैंक ने संसदीय समिति के समक्ष दोहराया था कि निजी क्रिप्टो परिसंपत्तियां उभरती अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम पैदा कर सकती हैं और इन्हें लेकर बेहद सतर्क रुख अपनाने की जरूरत है। इसके बावजूद समिति ने पूर्ण प्रतिबंध के बजाय चरणबद्ध नियमन का रास्ता सुझाया है।
फिलहाल भारत में क्रिप्टो परिसंपत्तियों पर कर व्यवस्था, धन शोधन रोधी नियम और रिपोर्टिंग से जुड़े प्रावधान लागू हैं, लेकिन इनके संचालन के लिए कोई समग्र कानूनी ढांचा मौजूद नहीं है।
स्व नियामक संस्थाओं पर दिया जोर
समिति ने सुझाव दिया है कि क्रिप्टो उद्योग के लिए मान्यता प्राप्त स्व नियामक संस्थाएं बनाई जाएं। ये संस्थाएं उद्योग के संचालन, मानकों और अनुपालन पर नजर रखेंगी, जबकि इनकी निगरानी भारतीय रिजर्व बैंक, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड या सरकार द्वारा नामित किसी अन्य नियामक के अधीन हो सकती है।
समिति का मानना है कि इस व्यवस्था से उद्योग को बिना पूरी तरह अनियंत्रित छोड़े जिम्मेदार तरीके से विकसित होने का अवसर मिलेगा। इससे नियामकों को भी बदलती तकनीक के अनुसार नियमों को लागू करने में सुविधा होगी।
विशेषज्ञों के अनुसार, कई देशों में वित्तीय क्षेत्रों में इस तरह की स्व नियामक व्यवस्था पहले से मौजूद है और भारत भी इसी मॉडल का उपयोग कर सकता है।
इस नए घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए Giottus.com के मुख्य कार्यकारी अधिकारी विक्रम सुब्बुराज ने CoinTelegraph से कहा:
"संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति की इस सिफारिश का सबसे बड़ा महत्व यह है कि अब नीति पर चर्चा पहले की तुलना में अधिक स्पष्ट और सटीक हो गई है। अब तक भारत ने क्रिप्टो गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए मुख्य रूप से कर प्रावधानों और धन शोधन रोधी रिपोर्टिंग नियमों का सहारा लिया है। ये दोनों जरूरी हैं, लेकिन इनमें से किसी का उद्देश्य कस्टडी, स्वामित्व और बाजार में आचरण को नियंत्रित करना नहीं था।"
उन्होंने आगे कहा:
"प्रस्तावित स्व नियामक संस्था (SRO) को मौजूदा व्यवस्था और भविष्य में बनने वाले व्यापक कानून के बीच एक पुल के रूप में देखा जाना चाहिए। यह नियामकों की निगरानी में पूरे उद्योग के लिए समान मानक तय कर सकती है। साथ ही, इससे नियामकों को यह समझने का भी अवसर मिलेगा कि यह बाजार वास्तव में कैसे काम करता है। हालांकि, इसे पूर्ण नियामकीय ढांचा नहीं माना जाना चाहिए।"
सुब्बुराज के अनुसार, समिति द्वारा डिजिटल परिसंपत्तियों के वर्गीकरण पर दिया गया जोर और भी अधिक महत्वपूर्ण है।
"भारत के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह दूसरे देशों की तरह केवल दो विकल्पों तक सीमित रहे, जहां किसी टोकन को या तो प्रतिभूति माना जाता है या फिर वित्तीय कानून के दायरे से बाहर रखा जाता है। निवेश से जुड़े उत्पादों का नियमन सेबी कर सकता है। भुगतान जैसे काम करने वाली डिजिटल परिसंपत्तियां भारतीय रिजर्व बैंक के दायरे में आ सकती हैं। वहीं, किसी जारीकर्ता के बिना मौजूद डिजिटल परिसंपत्तियों की ट्रेडिंग और कस्टडी के लिए अलग बाजार आचरण आधारित नियामकीय ढांचा बनाया जा सकता है।"
उन्होंने अंत में कहा:
"भारत के पास सबसे बड़ा अवसर यह है कि वह आर्थिक उपयोगिता के आधार पर नियम तैयार करे, इससे पहले कि नियामकीय सीमाएं अदालतों के फैसलों या किसी बड़े संकट के कारण तय हों। इस प्रक्रिया की सबसे बड़ी सफलता यही होगी कि ऐसा बाजार तैयार हो, जहां नई तकनीक और नए विचार विकसित हो सकें, जबकि अधिकार और जिम्मेदारियां स्पष्ट रूप से परिभाषित हों।"
सभी डिजिटल परिसंपत्तियों को एक जैसा न मानने की सलाह
रिपोर्ट में कहा गया है कि सभी प्रकार की वर्चुअल डिजिटल परिसंपत्तियों को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा। समिति ने सरकार से अलग अलग प्रकार की डिजिटल परिसंपत्तियों की स्पष्ट कानूनी परिभाषा तय करने की सिफारिश की है। इसमें क्रिप्टोकरेंसी, एनएफटी, विकेंद्रीकृत वित्त से जुड़े टोकन और अन्य डिजिटल परिसंपत्तियां शामिल हो सकती हैं।
इसके साथ ही समिति ने उद्योग के लिए न्यूनतम मानकों की भी सिफारिश की है। इनमें पारदर्शिता, सुशासन, आवश्यक खुलासे, निवेशक सुरक्षा, शिकायत निवारण व्यवस्था और नियामकीय अनुपालन जैसे पहलुओं को शामिल करने की बात कही गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्पष्ट वर्गीकरण से निवेशकों और उद्योग दोनों के लिए नियमों को समझना आसान होगा और भविष्य में कानूनी विवाद भी कम होंगे।
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टोकनाइज्ड परिसंपत्तियों पर भी मांगी स्पष्टता
समिति ने सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा है कि भविष्य में क्रिप्टो निवेश उत्पाद, टोकनाइज्ड प्रतिभूतियां और टोकनाइज्ड परिसंपत्तियों का कारोबार कराने वाले मंच क्या प्रतिभूति बाजार के नियमों के दायरे में आएंगे।
हाल के वर्षों में वास्तविक दुनिया की परिसंपत्तियों को डिजिटल टोकन के रूप में जारी करने का चलन तेजी से बढ़ा है। ऐसे में यह तय करना जरूरी हो गया है कि इनकी निगरानी कौन करेगा और इन पर कौन से नियम लागू होंगे।
समिति का मानना है कि इस विषय पर समय रहते स्पष्ट नीति बनने से निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा और उद्योग को भी नियामकीय स्पष्टता मिलेगी।
व्यापक कानून पर अभी और चर्चा होगी
समिति ने फिलहाल यह सिफारिश नहीं की है कि क्रिप्टो परिसंपत्तियों को प्रस्तावित प्रतिभूति बाजार संहिता में तुरंत शामिल किया जाए। रिपोर्ट के अनुसार, इस विषय पर सरकार और विभिन्न नियामकों के बीच अभी और व्यापक चर्चा की जरूरत है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह रुख बताता है कि भारत जल्दबाजी में व्यापक क्रिप्टो कानून लाने के बजाय चरणबद्ध तरीके से नियमन विकसित करना चाहता है। दूसरी ओर रिजर्व बैंक अब भी निजी क्रिप्टो परिसंपत्तियों को लेकर अपनी चिंताओं पर कायम है और वित्तीय स्थिरता को प्राथमिकता देने की बात कहता रहा है।
फिलहाल समिति की सिफारिश इस बात का संकेत है कि भारत में क्रिप्टो क्षेत्र को पूरी तरह कानूनी अनिश्चितता में छोड़ने के बजाय निगरानी और जवाबदेही के दायरे में लाने की दिशा में नीति निर्माताओं की सोच आगे बढ़ रही है। यदि सरकार इन सुझावों पर अमल करती है, तो देश में पहली बार क्रिप्टो उद्योग के लिए एक व्यवस्थित अंतरिम नियामकीय ढांचा तैयार हो सकता है।
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