
₹9.4 लाख से बड़े क्रिप्टो सौदों पर FIU की नजर, एक्सचेंजों से मांगा गया विस्तृत डेटा
भारत की वित्तीय खुफिया इकाई (FIU-IND) ने ₹9.4 लाख से अधिक के ओटीसी क्रिप्टो सौदों का डेटा मांगा है। यह कदम मनी लॉन्ड्रिंग जोखिम, लाभार्थी स्वामित्व की पहचान और क्रिप्टो लेनदेन पर निगरानी बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

भारत में क्रिप्टो लेनदेन पर नियामकीय निगरानी लगातार सख्त होती जा रही है। अब वित्तीय खुफिया इकाई (FIU-IND) ने प्रमुख क्रिप्टो एक्सचेंजों से ₹9.4 लाख से अधिक मूल्य वाले ओटीसी यानी ओवर-द-काउंटर क्रिप्टो सौदों का विस्तृत विवरण मांगा है। इस कदम को मनी लॉन्ड्रिंग पर अंकुश लगाने और बड़े क्रिप्टो लेनदेन में पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
रिपोर्टों के अनुसार, FIU विशेष रूप से उन सौदों की जांच करना चाहती है जो सामान्य एक्सचेंज ऑर्डर बुक के बाहर किए जाते हैं। ऐसे लेनदेन अक्सर बड़े निवेशकों, संस्थागत ग्राहकों और उच्च संपत्ति वाले व्यक्तियों द्वारा किए जाते हैं ताकि बाजार कीमतों पर अधिक प्रभाव डाले बिना बड़ी मात्रा में खरीद या बिक्री की जा सके।
विशेषज्ञों का कहना है कि ओटीसी बाजार क्रिप्टो उद्योग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन इसकी प्रकृति के कारण नियामकों के लिए इसकी निगरानी अपेक्षाकृत चुनौतीपूर्ण होती है।
ओटीसी क्रिप्टो सौदे क्या होते हैं?
सामान्य क्रिप्टो ट्रेडिंग में खरीद और बिक्री सार्वजनिक ऑर्डर बुक के माध्यम से होती है, जहां बाजार कीमत सभी को दिखाई देती है। इसके विपरीत, ओटीसी लेनदेन सीधे खरीदार और विक्रेता के बीच तय किए जाते हैं और अक्सर बड़ी रकम के सौदों के लिए उपयोग किए जाते हैं।
बड़े निवेशक आमतौर पर ओटीसी सेवाओं का उपयोग इसलिए करते हैं ताकि उनके लेनदेन से बाजार में अचानक उतार चढ़ाव न आए। लेकिन कई मामलों में इन सौदों में शामिल वास्तविक लाभार्थियों या स्वामित्व संरचना की पहचान करना कठिन हो सकता है। यही कारण है कि FIU इन लेनदेन को लेकर अधिक जानकारी जुटाना चाहती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, नियामकीय संस्थाओं की चिंता केवल लेनदेन की मात्रा को लेकर नहीं है, बल्कि यह भी है कि कहीं ऐसे माध्यमों का उपयोग अवैध धन को छिपाने या संदिग्ध गतिविधियों के लिए तो नहीं किया जा रहा।
क्यों बढ़ी है निगरानी?
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने क्रिप्टो क्षेत्र को मनी लॉन्ड्रिंग रोधी नियमों के दायरे में लाने के लिए कई कदम उठाए हैं। क्रिप्टो सेवा प्रदाताओं और एक्सचेंजों को ग्राहक पहचान, संदिग्ध गतिविधियों की रिपोर्टिंग और रिकॉर्ड रखने जैसे नियमों का पालन करना पड़ता है।
FIU का मानना है कि बड़े ओटीसी सौदे संभावित जोखिम पैदा कर सकते हैं, खासकर तब जब लेनदेन जटिल स्वामित्व वाली कंपनियों या कई स्तरों वाली संस्थाओं के माध्यम से किए जाएं। ऐसे मामलों में धन के वास्तविक स्रोत और अंतिम लाभार्थी की पहचान करना कठिन हो सकता है।
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हाल के वर्षों में सरकार और जांच एजेंसियों ने क्रिप्टो परिसंपत्तियों के उपयोग से जुड़े धोखाधड़ी, हवाला नेटवर्क और अन्य वित्तीय अपराधों के मामलों पर भी ध्यान बढ़ाया है। इसी व्यापक प्रयास के तहत ओटीसी बाजार की निगरानी को मजबूत किया जा रहा है।
एक्सचेंजों और निवेशकों पर क्या होगा असर?
उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम के बाद एक्सचेंजों को अपने अनुपालन तंत्र को और मजबूत करना पड़ सकता है। बड़े ग्राहकों से अतिरिक्त दस्तावेज, स्वामित्व संबंधी जानकारी और लेनदेन के उद्देश्य से जुड़े विवरण मांगे जा सकते हैं।
कुछ बाजार जानकारों का मानना है कि बढ़ी हुई निगरानी के कारण बड़े ओटीसी लेनदेन की प्रक्रिया थोड़ी लंबी हो सकती है। हालांकि इससे बाजार में पारदर्शिता और भरोसा बढ़ने की संभावना भी है।
क्रिप्टो एक्सचेंजों के लिए यह कदम दोधारी तलवार जैसा माना जा रहा है। एक ओर उन्हें अधिक अनुपालन लागत का सामना करना पड़ सकता है, वहीं दूसरी ओर स्पष्ट निगरानी व्यवस्था संस्थागत निवेशकों के लिए बाजार को अधिक विश्वसनीय बना सकती है।
भारत के क्रिप्टो नियमन का अगला चरण?
विशेषज्ञों का कहना है कि FIU की यह कार्रवाई भारत के क्रिप्टो नियामकीय ढांचे के अगले चरण का संकेत हो सकती है। देश में पहले ही कई क्रिप्टो एक्सचेंज FIU के साथ पंजीकृत हैं और उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग रोधी नियमों का पालन करना होता है।
अब ध्यान केवल एक्सचेंजों के पंजीकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि बड़े और जटिल लेनदेन की गहराई से निगरानी पर भी है। इससे यह संकेत मिलता है कि सरकार क्रिप्टो क्षेत्र को पूरी तरह प्रतिबंधित करने के बजाय उसे अधिक पारदर्शी और जवाबदेह ढांचे के भीतर संचालित करना चाहती है।
फिलहाल उद्योग की नजर इस बात पर है कि एक्सचेंज FIU को किस प्रकार का डेटा उपलब्ध कराते हैं और इसके बाद नियामक क्या अतिरिक्त कदम उठाते हैं। लेकिन इतना स्पष्ट है कि भारत में बड़े क्रिप्टो लेनदेन अब पहले की तुलना में कहीं अधिक निगरानी के दायरे में आ चुके हैं।
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