
क्रिप्टो नियमन की ओर भारत का बड़ा कदम, समिति ने अंतरिम ढांचा सुझाया
संसद की वित्त संबंधी समिति ने भारत में क्रिप्टो के लिए अंतरिम नियामकीय ढांचे की सिफारिश की है। जानिए SRO, निवेशक सुरक्षा और टोकनाइज्ड परिसंपत्तियों पर क्या सुझाव दिए गए हैं।

भारत में क्रिप्टो परिसंपत्तियों को लेकर लंबे समय से जारी अनिश्चितता के बीच अब नियमन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सामने आई है। संसद की वित्त संबंधी समिति ने सरकार को सुझाव दिया है कि व्यापक कानून बनने का इंतजार करने के बजाय फिलहाल एक अंतरिम नियामकीय ढांचा तैयार किया जाए। समिति का मानना है कि इससे तेजी से बढ़ रहे डिजिटल परिसंपत्ति बाजार में पारदर्शिता बढ़ेगी और निवेशकों को बेहतर सुरक्षा मिल सकेगी।
फिलहाल भारत में क्रिप्टो परिसंपत्तियों पर कर नियम, धन शोधन रोधी प्रावधान और रिपोर्टिंग संबंधी नियम लागू हैं, लेकिन इनके संचालन के लिए कोई समग्र नियामकीय व्यवस्था मौजूद नहीं है। ऐसे में समिति ने चरणबद्ध तरीके से निगरानी व्यवस्था विकसित करने की सिफारिश की है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकार इस सुझाव पर आगे बढ़ती है, तो यह भारत के क्रिप्टो उद्योग के लिए एक अहम बदलाव साबित हो सकता है।
स्व नियामक संस्थाओं को मिल सकती है बड़ी भूमिका
समिति ने सुझाव दिया है कि क्रिप्टो उद्योग के लिए मान्यता प्राप्त स्व नियामक संस्थाएं यानी सेल्फ रेगुलेटरी ऑर्गनाइजेशन बनाई जाएं। ये संस्थाएं उद्योग के संचालन, मानकों और अनुपालन पर नजर रखेंगी। हालांकि इन पर एक नामित सरकारी नियामक की निगरानी भी रहेगी।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस मॉडल का उद्देश्य उद्योग को पूरी तरह बिना नियंत्रण छोड़े, उसे जिम्मेदार तरीके से विकसित होने का अवसर देना है। कई देशों में वित्तीय क्षेत्रों में इसी तरह की व्यवस्था पहले से लागू है, जहां उद्योग और नियामक मिलकर निगरानी व्यवस्था संचालित करते हैं।
समिति का मानना है कि इससे नियमों का पालन बेहतर तरीके से हो सकेगा और बदलती तकनीक के अनुसार उद्योग को तेजी से दिशा भी मिल सकेगी।
अलग अलग डिजिटल परिसंपत्तियों की अलग पहचान
रिपोर्ट में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि सभी डिजिटल परिसंपत्तियों को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए। समिति ने सरकार से स्पष्ट कानूनी परिभाषाएं तय करने की सिफारिश की है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कौन सी डिजिटल परिसंपत्ति किस श्रेणी में आती है।
इसके अलावा रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि उद्योग के लिए न्यूनतम मानक तय किए जाएं। इनमें सुशासन, पारदर्शिता, आवश्यक खुलासे, निवेशक सुरक्षा, शिकायत निवारण व्यवस्था और नियामकीय अनुपालन जैसे पहलू शामिल हों।
विशेषज्ञों का कहना है कि स्पष्ट वर्गीकरण से निवेशकों, एक्सचेंजों और नियामकों सभी के लिए नियमों को समझना आसान होगा। इससे भविष्य में किसी भी विवाद या भ्रम की स्थिति भी कम हो सकती है।
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टोकनाइज्ड परिसंपत्तियों पर भी मांगी स्पष्टता
समिति ने सरकार से यह भी स्पष्ट करने को कहा है कि भविष्य में क्रिप्टो निवेश उत्पाद, टोकनाइज्ड प्रतिभूतियां और ऐसे एक्सचेंज जो टोकनाइज्ड परिसंपत्तियों का कारोबार कराते हैं, क्या प्रतिभूति बाजार के नियमों के दायरे में आएंगे।
पिछले कुछ वर्षों में वास्तविक दुनिया की परिसंपत्तियों को डिजिटल टोकन के रूप में जारी करने का चलन तेजी से बढ़ा है। ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि इन उत्पादों की निगरानी कौन करेगा और उन पर कौन से नियम लागू होंगे।
समिति का मानना है कि इस विषय पर समय रहते स्पष्ट नीति बनाई जानी चाहिए ताकि निवेशकों और उद्योग दोनों को नियामकीय स्पष्टता मिल सके।
व्यापक कानून से पहले चरणबद्ध नियमन
हालांकि समिति ने फिलहाल यह सिफारिश नहीं की है कि क्रिप्टो परिसंपत्तियों को प्रस्तावित प्रतिभूति बाजार संहिता के दायरे में तुरंत शामिल किया जाए। रिपोर्ट के अनुसार, इस विषय पर सरकार और विभिन्न नियामकों के बीच और व्यापक चर्चा की आवश्यकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि समिति का रुख यह संकेत देता है कि भारत जल्दबाजी में व्यापक क्रिप्टो कानून लाने के बजाय चरणबद्ध तरीके से नियमन विकसित करना चाहता है।
फिलहाल यह प्रस्ताव इस बात का संकेत है कि सरकार और नीति निर्माता अब क्रिप्टो उद्योग को पूरी तरह कानूनी अनिश्चितता में छोड़ने के बजाय निगरानी और नियमन के दायरे में लाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। यदि इन सिफारिशों पर अमल होता है, तो भारत में क्रिप्टो उद्योग को पहली बार एक संगठित और स्पष्ट नियामकीय ढांचा मिलने की संभावना बढ़ सकती है।
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