अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब क्रिप्टो बाजार पर भी साफ दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा ईरान को 48 घंटे का अल्टीमेटम दिए जाने के बाद वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ गई है। इस बीच बिटकॉइन की कीमतों में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अल्टीमेटम के बाद निवेशकों ने जोखिम वाले एसेट्स से दूरी बनानी शुरू कर दी, जिससे बिटकॉइन पर दबाव आया। हाल ही में इसकी कीमत लगभग 66 हजार से 67 हजार डॉलर के आसपास बनी हुई है।
क्यों गिरती है कीमत, फिर कैसे आती है तेजी
क्रिप्टो बाजार अब केवल टेक्नोलॉजी या मांग पर निर्भर नहीं है, बल्कि वैश्विक घटनाओं से भी प्रभावित हो रहा है। जब भी भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है, निवेशक सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख करते हैं, जिससे बिटकॉइन जैसे एसेट्स में गिरावट देखी जाती है।
हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि जब स्थिति थोड़ी स्थिर होती है या तनाव कम होने के संकेत मिलते हैं, तो बाजार तेजी से रिकवर करता है। उदाहरण के तौर पर, जब अमेरिका ने ईरान पर हमले टालने का संकेत दिया था, तब बिटकॉइन $70,000 के पार पहुंच गया था।
इसी वजह से विशेषज्ञ मानते हैं कि मौजूदा हालात में अगर तनाव कम होता है, तो बिटकॉइन दोबारा $75,000 के स्तर की ओर बढ़ सकता है।
तेल कीमत और वैश्विक अर्थव्यवस्था का कनेक्शन
ईरान और अमेरिका के बीच तनाव का सीधा असर तेल बाजार पर भी पड़ रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान के कारण तेल की कीमतें $100 से ऊपर पहुंच गई हैं, जिससे महंगाई का खतरा बढ़ रहा है।
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जब तेल महंगा होता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ता है। इसका असर शेयर बाजार और क्रिप्टो जैसे जोखिम वाले निवेश पर भी पड़ता है। यही कारण है कि निवेशक फिलहाल सतर्क नजर आ रहे हैं और बड़ी पोजिशन लेने से बच रहे हैं।
क्या $75,000 का स्तर फिर संभव है
विशेषज्ञों का कहना है कि बिटकॉइन का भविष्य फिलहाल पूरी तरह बाजार की भावना और वैश्विक घटनाओं पर निर्भर है। अगर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होता है, तो निवेशकों का भरोसा लौट सकता है और कीमतों में तेजी आ सकती है।
दूसरी ओर, अगर हालात और बिगड़ते हैं, तो बाजार में और गिरावट भी देखी जा सकती है। कुछ विश्लेषकों के अनुसार, मौजूदा स्तर पर बिटकॉइन मजबूत सपोर्ट जोन के करीब है, जिससे रिकवरी की संभावना बनी हुई है।
कुल मिलाकर, यह साफ है कि क्रिप्टो बाजार अब वैश्विक राजनीति से अलग नहीं रहा। निवेशकों को अब केवल तकनीकी संकेत ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय घटनाओं पर भी नजर रखनी होगी।
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