
भारत में 80% क्रिप्टो कारोबार अब फ्यूचर्स में, क्या 1% TDS ने बदल दी निवेशकों की रणनीति?
भारत में अब लगभग 80% क्रिप्टो कारोबार फ्यूचर्स में हो रहा है। रिपोर्ट के अनुसार 1% TDS और ऊंचे कर नियमों ने निवेशकों को स्पॉट ट्रेडिंग से डेरिवेटिव बाजार की ओर धकेला है।

भारत में क्रिप्टो कारोबार का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। पहले जहां अधिकांश निवेशक सीधे बिटकॉइन और अन्य डिजिटल परिसंपत्तियां खरीदते और बेचते थे, वहीं अब बड़ी संख्या में लोग फ्यूचर्स कारोबार की ओर बढ़ रहे हैं। हाल ही में सामने आई एक उद्योग रिपोर्ट के अनुसार, देश में होने वाले लगभग 80 प्रतिशत क्रिप्टो कारोबार का हिस्सा अब फ्यूचर्स बाजार से आता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदलाव के पीछे केवल निवेशकों की बदलती पसंद नहीं, बल्कि भारत की कर व्यवस्था भी एक बड़ी वजह है। खासतौर पर स्पॉट ट्रेडिंग पर लागू 1 प्रतिशत टीडीएस और 30 प्रतिशत कर नियमों ने कई सक्रिय कारोबारियों को ऐसे विकल्प तलाशने के लिए प्रेरित किया है, जहां पूंजी का उपयोग अधिक प्रभावी तरीके से किया जा सके।
क्यों बढ़ रहा है फ्यूचर्स कारोबार?
फ्यूचर्स कारोबार में निवेशक किसी डिजिटल परिसंपत्ति को सीधे खरीदने के बजाय उसकी भविष्य की कीमत पर सौदा करते हैं। इससे कम पूंजी में भी बड़ी स्थिति बनाई जा सकती है। यही कारण है कि सक्रिय कारोबारी और अल्पकालिक निवेशक इस विकल्प को तेजी से अपना रहे हैं।
उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि स्पॉट बाजार में हर लेनदेन पर 1 प्रतिशत टीडीएस लगने से कारोबारियों की पूंजी बार बार अटक जाती है। यदि कोई निवेशक दिन में कई बार खरीद और बिक्री करता है, तो उसकी कार्यशील पूंजी लगातार कम होती जाती है। इसके विपरीत, कई विदेशी मंचों पर उपलब्ध फ्यूचर्स उत्पादों में ऐसी स्थिति नहीं बनती, जिससे वे अधिक आकर्षक दिखाई देते हैं।
विश्लेषकों के अनुसार, यही कारण है कि भारतीय निवेशकों का बड़ा हिस्सा अब डेरिवेटिव आधारित कारोबार को प्राथमिकता देने लगा है।
1% TDS का कितना पड़ा असर?
क्रिप्टो उद्योग लंबे समय से यह तर्क देता रहा है कि 1 प्रतिशत टीडीएस का उद्देश्य लेनदेन पर नजर रखना था, लेकिन इसका सबसे बड़ा असर कारोबार की मात्रा पर पड़ा। कई घरेलू एक्सचेंजों ने पहले भी दावा किया है कि इस नियम के बाद बड़ी संख्या में सक्रिय निवेशकों ने विदेशी मंचों का रुख किया।
कर विशेषज्ञों का कहना है कि टीडीएस अंतिम कर नहीं होता, लेकिन बार बार कटौती होने से कारोबारियों की नकदी प्रभावित होती है। खासकर उन लोगों के लिए जो कम समय में कई सौदे करते हैं, यह व्यवस्था चुनौतीपूर्ण बन जाती है।
यही वजह है कि उद्योग संगठनों ने कई बार सरकार से टीडीएस की दर घटाने या इसकी व्यवस्था में बदलाव करने की मांग की है। उनका कहना है कि इससे कारोबार का बड़ा हिस्सा फिर से भारतीय मंचों पर लौट सकता है।
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घरेलू एक्सचेंजों के सामने बढ़ी चुनौती
फ्यूचर्स कारोबार में तेजी का असर भारतीय क्रिप्टो एक्सचेंजों पर भी दिखाई दे रहा है। कई निवेशक अब उन वैश्विक मंचों का उपयोग कर रहे हैं जहां अधिक उत्पाद, बेहतर तरलता और उन्नत कारोबार सुविधाएं उपलब्ध हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही रुझान जारी रहा, तो घरेलू मंचों के लिए प्रतिस्पर्धा और कठिन हो सकती है। इससे सरकार के लिए लेनदेन पर निगरानी रखना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है, क्योंकि बड़ी मात्रा में कारोबार देश के बाहर संचालित होने लगता है।
हालांकि कुछ जानकार यह भी कहते हैं कि फ्यूचर्स कारोबार में जोखिम स्पॉट निवेश की तुलना में अधिक होता है। इसमें कीमतों में छोटे उतार चढ़ाव से भी बड़ा लाभ या भारी नुकसान हो सकता है। इसलिए नए निवेशकों को बिना पूरी जानकारी के ऐसे उत्पादों में प्रवेश नहीं करना चाहिए।
आगे क्या बदल सकता है?
क्रिप्टो उद्योग को उम्मीद है कि आने वाले समय में सरकार कर नियमों और नियामकीय ढांचे की समीक्षा कर सकती है। यदि टीडीएस से जुड़े नियमों में बदलाव होता है या घरेलू एक्सचेंजों के लिए अधिक अनुकूल व्यवस्था बनाई जाती है, तो स्पॉट कारोबार फिर से गति पकड़ सकता है।
दूसरी ओर, यदि मौजूदा व्यवस्था जारी रहती है, तो फ्यूचर्स और अन्य डेरिवेटिव उत्पादों की हिस्सेदारी और बढ़ सकती है। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि भारत दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल परिसंपत्ति बाजारों में शामिल है, इसलिए यहां की कर नीति और नियामकीय फैसले पूरे उद्योग की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि भारतीय निवेशकों की रणनीति बदल रही है। अब केवल डिजिटल परिसंपत्तियां खरीदकर लंबे समय तक रखने के बजाय बड़ी संख्या में कारोबारी फ्यूचर्स बाजार की ओर बढ़ रहे हैं। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार की नीतियां इस बदलते रुझान को किस दिशा में ले जाती हैं।
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