
वैश्विक उथल पुथल के बीच Sensex और Nifty ने की जोरदार वापसी
वैश्विक तनाव के बीच Sensex और Nifty में तेज गिरावट के बाद मजबूत वापसी देखने को मिली। जानिए भारतीय शेयर बाजार ने कैसे वैश्विक अनिश्चितता के बावजूद मजबूती दिखाई।

वैश्विक बाजारों में बढ़ती अनिश्चितता और पश्चिम एशिया से जुड़ी भू राजनीतिक चिंताओं के बीच भारतीय शेयर बाजार ने एक बार फिर अपनी मजबूती का परिचय दिया है। जुलाई की शुरुआत में Sensex और Nifty में तेज गिरावट देखने को मिली थी, लेकिन कुछ ही कारोबारी सत्रों में दोनों प्रमुख सूचकांक संभल गए और निवेशकों का भरोसा फिर लौटने लगा। विश्लेषकों का कहना है कि यह वापसी भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत बुनियाद और घरेलू निवेशकों की लगातार खरीदारी का संकेत है।
बाजार जानकारों के अनुसार शुरुआती गिरावट की मुख्य वजह अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ा तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और वैश्विक शेयर बाजारों में बिकवाली थी। इन कारणों से विदेशी निवेशकों ने जोखिम वाले निवेश से दूरी बनाई, जिसका असर भारतीय बाजार पर भी पड़ा। हालांकि घरेलू संस्थागत निवेशकों और म्यूचुअल फंडों की खरीदारी ने बाजार को तेजी से संभालने में अहम भूमिका निभाई।
गिरावट के बाद कैसे संभला बाजार?
8 जुलाई को Sensex में दो प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई थी। उस समय निवेशकों के बीच यह आशंका बढ़ गई थी कि यदि पश्चिम एशिया का तनाव और बढ़ा तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका असर पड़ सकता है। बढ़ती तेल कीमतों ने भी चिंता बढ़ाई थी क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है।
लेकिन अगले कुछ कारोबारी सत्रों में तस्वीर बदलने लगी। विदेशी बिकवाली के बावजूद घरेलू निवेशकों ने गिरावट को खरीदारी के अवसर के रूप में देखा। म्यूचुअल फंडों और अन्य घरेलू संस्थागत निवेशकों की मजबूत भागीदारी के कारण बाजार ने नुकसान की भरपाई शुरू कर दी। इसके साथ ही कुछ बड़े कॉरपोरेट नतीजों और सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में खरीदारी ने भी बाजार को सहारा दिया।
घरेलू अर्थव्यवस्था बनी सबसे बड़ा सहारा
विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय बाजार की सबसे बड़ी ताकत घरेलू निवेशकों की बढ़ती भागीदारी है। पिछले कुछ वर्षों में व्यवस्थित निवेश योजनाओं के माध्यम से म्यूचुअल फंडों में लगातार निवेश बढ़ा है। इसी वजह से विदेशी निवेशकों की बिकवाली का असर पहले की तुलना में कम दिखाई देता है।
इसके अलावा भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था भी तेजी से विस्तार कर रही है। राष्ट्रीय भुगतान निगम के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में UPI के जरिए 241.6 अरब से अधिक लेनदेन दर्ज किए गए। यह आंकड़ा देश की मजबूत डिजिटल वित्तीय व्यवस्था को दर्शाता है और निवेशकों के भरोसे को भी मजबूत करता है।
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बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि मजबूत घरेलू मांग, बैंकिंग क्षेत्र की स्थिर स्थिति और नियमित निवेश प्रवाह भारतीय शेयर बाजार को बाहरी झटकों से उबरने में मदद कर रहे हैं।
वैश्विक चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं
हालांकि बाजार में सुधार जरूर हुआ है, लेकिन जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। पश्चिम एशिया की स्थिति, कच्चे तेल की कीमतें, अमेरिकी ब्याज दरों की दिशा और वैश्विक आर्थिक वृद्धि जैसे कई कारक आगे भी बाजार को प्रभावित कर सकते हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि यदि तेल की कीमतों में फिर तेज उछाल आता है या वैश्विक तनाव बढ़ता है, तो निवेशकों की धारणा दोबारा कमजोर हो सकती है। दूसरी ओर यदि महंगाई नियंत्रित रहती है और वैश्विक केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में राहत देते हैं, तो भारतीय बाजार को अतिरिक्त समर्थन मिल सकता है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
विशेषज्ञों का मानना है कि हालिया घटनाक्रम यह दिखाता है कि भारतीय बाजार अब केवल विदेशी निवेश पर निर्भर नहीं है। घरेलू संस्थागत निवेशकों की मजबूत भूमिका और खुदरा निवेशकों की बढ़ती भागीदारी ने बाजार को अधिक संतुलित बनाया है।
हालांकि अल्पकाल में उतार चढ़ाव जारी रह सकता है, लेकिन दीर्घकालिक निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात मजबूत आर्थिक बुनियाद और कंपनियों के प्रदर्शन पर ध्यान देना है। बाजार में आई हालिया तेजी यह संकेत देती है कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारतीय शेयर बाजार में लचीलापन मौजूद है।
फिलहाल निवेशकों की नजर आगामी कंपनियों के तिमाही नतीजों, विदेशी निवेश के रुख, कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक घटनाक्रम पर बनी रहेगी। यही कारक तय करेंगे कि Sensex और Nifty अपनी हालिया वापसी को कितने समय तक बरकरार रख पाते हैं।
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