
आठ महीनों में क्रिप्टो बाजार से गायब हुआ भारत की आधी GDP के बराबर मूल्य, आखिर क्यों आई इतनी बड़ी गिरावट?
पिछले आठ महीनों में वैश्विक क्रिप्टो बाजार से भारत की GDP के लगभग आधे के बराबर मूल्य गायब हो गया। जानिए इस बड़ी गिरावट के पीछे कौन से आर्थिक, बाजार और निवेशक कारक जिम्मेदार हैं।

वैश्विक क्रिप्टो बाजार ने पिछले आठ महीनों में भारी गिरावट का सामना किया है। इस दौरान बाजार पूंजीकरण में इतनी बड़ी कमी आई कि मिटा हुआ मूल्य भारत की कुल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के लगभग आधे के बराबर बताया जा रहा है। कभी रिकॉर्ड ऊंचाइयों पर पहुंचा डिजिटल परिसंपत्ति बाजार अब निवेशकों की सतर्कता, आर्थिक अनिश्चितताओं और कमजोर मांग के दबाव में नजर आ रहा है।
विश्लेषकों के अनुसार, यह गिरावट केवल बिटकॉइन या कुछ चुनिंदा टोकनों तक सीमित नहीं रही। लगभग पूरे क्रिप्टो बाजार में निवेशकों ने जोखिम कम करने की रणनीति अपनाई, जिससे अरबों डॉलर का मूल्य समाप्त हो गया। हाल के महीनों में अकेले कुछ ही हफ्तों में क्रिप्टो बाजार से 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक मूल्य मिटने की घटनाएं भी दर्ज की गईं।
रिकॉर्ड ऊंचाई से तेज गिरावट तक का सफर
2025 के अंत और 2026 की शुरुआत में क्रिप्टो बाजार को संस्थागत निवेश, बिटकॉइन आधारित निवेश उत्पादों और बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता का लाभ मिला था। बिटकॉइन ने नए रिकॉर्ड बनाए और कई डिजिटल परिसंपत्तियों में तेज तेजी देखने को मिली।
लेकिन जैसे ही वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां बदलीं, निवेशकों का रुख भी बदलने लगा। ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता, आर्थिक विकास की धीमी रफ्तार और जोखिम वाली परिसंपत्तियों से दूरी ने क्रिप्टो बाजार को प्रभावित किया। परिणामस्वरूप निवेशकों ने मुनाफावसूली शुरू की और बाजार में बिकवाली का दबाव बढ़ता गया।
विशेषज्ञों का कहना है कि तेजी के दौर में बाजार में आई अत्यधिक सट्टेबाजी ने भी गिरावट को गहरा करने का काम किया। जब कीमतें नीचे आने लगीं तो लीवरेज पर निवेश करने वाले कई निवेशकों की पोजीशन समाप्त हो गईं, जिससे बिकवाली और बढ़ गई।
निवेशकों की बदलती प्राथमिकतियां बनीं बड़ा कारण
क्रिप्टो बाजार की कमजोरी के पीछे एक बड़ा कारण निवेशकों की बदलती प्राथमिकतियां भी मानी जा रही हैं। हाल के महीनों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित कंपनियों, तकनीकी शेयरों और अन्य पारंपरिक निवेश साधनों ने निवेशकों का ध्यान आकर्षित किया है।
कई बड़े निवेशकों ने उच्च जोखिम वाले डिजिटल परिसंपत्ति बाजार से पूंजी निकालकर अपेक्षाकृत स्थिर क्षेत्रों में निवेश बढ़ाया। इससे क्रिप्टो बाजार में नए धन का प्रवाह कमजोर पड़ा। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, संस्थागत निवेशकों की गतिविधियों में कमी और कुछ निवेश उत्पादों से निकासी ने भी बाजार पर दबाव बढ़ाया।
विश्लेषकों का मानना है कि क्रिप्टो बाजार अब पहले की तुलना में वैश्विक वित्तीय बाजारों से अधिक जुड़ चुका है। इसलिए जब शेयर बाजारों या तकनीकी क्षेत्र में कमजोरी आती है, तो उसका असर डिजिटल परिसंपत्तियों पर भी दिखाई देता है।
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नियामकीय अनिश्चितता भी बनी चुनौती
दुनिया के कई देशों में क्रिप्टो क्षेत्र को लेकर नियमों पर चर्चा जारी है। भारत समेत कई बड़े बाजारों में अभी भी स्पष्ट नियामकीय ढांचा पूरी तरह विकसित नहीं हुआ है।
भारत में उद्योग लंबे समय से स्पष्ट नीति और नियामक व्यवस्था की मांग कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अनिश्चितता निवेशकों और कंपनियों दोनों को प्रभावित करती है, क्योंकि उन्हें भविष्य की नीतियों का स्पष्ट अंदाजा नहीं होता।
इसके अलावा कई देशों में कर नियमों को सख्त किया गया है और लेनदेन की निगरानी बढ़ाई गई है। इससे कुछ निवेशकों की सक्रियता कम हुई है और बाजार में कारोबार की मात्रा पर असर पड़ा है।
क्या बाजार में वापसी की संभावना है?
हालांकि मौजूदा हालात चुनौतीपूर्ण हैं, लेकिन कई विशेषज्ञ इसे क्रिप्टो उद्योग के लिए एक स्वाभाविक सुधार भी मान रहे हैं। उनका तर्क है कि तेजी के बाद बड़े सुधार अक्सर बाजार को अधिक मजबूत आधार प्रदान करते हैं।
बिटकॉइन और Ethereum जैसी प्रमुख डिजिटल परिसंपत्तियां अभी भी संस्थागत निवेशकों की रुचि का केंद्र बनी हुई हैं। वहीं टोकनाइजेशन, विकेंद्रीकृत वित्त और ब्लॉकचेन आधारित वित्तीय सेवाओं जैसे क्षेत्रों में नवाचार जारी है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि वैश्विक आर्थिक स्थिति स्थिर होती है, ब्याज दरों को लेकर स्पष्टता आती है और निवेशकों का भरोसा लौटता है, तो क्रिप्टो बाजार फिर से मजबूती दिखा सकता है।
फिलहाल इतना साफ है कि पिछले आठ महीनों में बाजार से भारत की आधी GDP के बराबर मूल्य का गायब होना क्रिप्टो उद्योग के इतिहास की सबसे बड़ी गिरावटों में से एक है। हालांकि समर्थकों का मानना है कि यह उद्योग अभी भी विकास के शुरुआती चरण में है और लंबी अवधि में इसकी दिशा तकनीकी नवाचार और वास्तविक उपयोग पर निर्भर करेगी।
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