
भारत की क्रिप्टो कर नीति पर संसद में उठे सवाल, हर साल $6.1 अरब विदेशी मंचों की ओर जाने का दावा
भारत की क्रिप्टो कर व्यवस्था पर संसद में सवाल उठे हैं। उद्योग के अनुसार 30% कर और 1% TDS के कारण हर साल करीब $6.1 अरब का कारोबार विदेशी मंचों की ओर जा रहा है। जानिए इस बहस के पीछे की पूरी कहानी।

भारत की क्रिप्टो कर व्यवस्था एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति के सामने हाल ही में देश के प्रमुख क्रिप्टो मंचों ने दावा किया कि मौजूदा कर ढांचे के कारण बड़ी मात्रा में कारोबार विदेशी मंचों की ओर जा रहा है। उद्योग से जुड़े प्रतिनिधियों का कहना है कि हर साल करीब 6.1 अरब डॉलर का पूंजी प्रवाह भारत से बाहर चला जाता है, जबकि घरेलू मंच कारोबार और तरलता की कमी से जूझ रहे हैं।
यह मुद्दा ऐसे समय उठा है जब देश में आयकर रिटर्न दाखिल करने का दौर शुरू हो चुका है और डिजिटल परिसंपत्तियों से जुड़े लेनदेन पर निगरानी पहले की तुलना में अधिक सख्त हो रही है। ऐसे में उद्योग जगत और नीति निर्माताओं के बीच यह बहस तेज हो गई है कि क्या मौजूदा कर व्यवस्था अपने उद्देश्य को पूरा कर रही है या फिर इसके अनपेक्षित परिणाम सामने आ रहे हैं।
30% कर और 1% TDS पर उद्योग की आपत्ति
भारत में क्रिप्टो परिसंपत्तियों से होने वाले लाभ पर 30% कर लगाया जाता है। इसके अलावा प्रत्येक लेनदेन पर 1% स्रोत पर कर कटौती यानी TDS भी लागू है। उद्योग का तर्क है कि यह व्यवस्था निवेशकों और सक्रिय कारोबारियों के लिए अतिरिक्त बोझ पैदा करती है।
क्रिप्टो कंपनियों के अनुसार, TDS का सबसे बड़ा प्रभाव बाजार में उपलब्ध पूंजी पर पड़ता है। बार-बार कारोबार करने वाले निवेशकों की राशि प्रत्येक लेनदेन पर आंशिक रूप से फंस जाती है, जिससे उनके लिए उसी पूंजी का दोबारा उपयोग करना कठिन हो जाता है। इसी कारण कई निवेशक ऐसे विदेशी मंचों की ओर रुख करते हैं जहां इस तरह की व्यवस्था लागू नहीं है।
उद्योग संगठनों का दावा है कि 2022 में कर नियम लागू होने के बाद भारतीय निवेशकों के क्रिप्टो कारोबार का बड़ा हिस्सा विदेशी मंचों पर स्थानांतरित हो गया। कुछ अध्ययनों में यह आंकड़ा 90% से अधिक बताया गया है।
संसद में क्यों बढ़ी चिंता?
संसदीय समिति की हालिया बैठक में इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा हुई। समिति के सदस्यों ने यह जानने की कोशिश की कि आखिर बड़ी मात्रा में डिजिटल पूंजी भारत के वित्तीय तंत्र से बाहर क्यों जा रही है। रिपोर्टों के अनुसार, समिति ने उद्योग प्रतिनिधियों और संबंधित अधिकारियों दोनों से जानकारी मांगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि चिंता केवल कर संग्रह तक सीमित नहीं है। यदि कारोबार और निवेश गतिविधियां विदेशी मंचों पर चली जाती हैं, तो घरेलू कंपनियों की वृद्धि प्रभावित हो सकती है। साथ ही देश में विकसित हो रहे ब्लॉकचेन और वेब3 उद्योग को भी इसका असर झेलना पड़ सकता है।
भारत वर्तमान में दुनिया के सबसे बड़े क्रिप्टो अपनाने वाले देशों में गिना जाता है। इसके बावजूद घरेलू मंचों की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कमजोर बनी हुई है, जिसे उद्योग मौजूदा कर ढांचे से जोड़कर देखता है।
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निवेशकों पर बढ़ रही निगरानी
इस बहस के बीच सरकार कर अनुपालन को लेकर भी सख्त रुख अपनाती दिखाई दे रही है। नए नियमों के तहत पंजीकृत क्रिप्टो मंचों को उपयोगकर्ताओं के लेनदेन संबंधी आंकड़े आयकर विभाग के साथ साझा करने होते हैं। इसके अलावा डिजिटल परिसंपत्तियों से होने वाली आय को आयकर रिटर्न में अलग से दर्ज करना अनिवार्य है।
रिपोर्टों के अनुसार, आयकर विभाग उन्नत विश्लेषण प्रणालियों का उपयोग कर रहा है ताकि घोषित और वास्तविक लेनदेन के बीच अंतर की पहचान की जा सके। पहले भी हजारों निवेशकों को नोटिस भेजे जा चुके हैं, जिनमें अपूर्ण या गलत जानकारी मिलने की बात सामने आई थी।
आगे क्या हो सकता है?
फिलहाल सरकार की ओर से कर ढांचे में किसी तत्काल बदलाव का संकेत नहीं मिला है। हालांकि उद्योग लगातार यह मांग कर रहा है कि 1% TDS को कम किया जाए या उसमें संशोधन किया जाए ताकि कारोबार पर पड़ने वाला दबाव घट सके।
दूसरी ओर, सरकार का ध्यान कर अनुपालन और पारदर्शिता बढ़ाने पर है। आने वाले वर्षों में वैश्विक क्रिप्टो रिपोर्टिंग ढांचे को अपनाने की दिशा में भी काम चल रहा है, जिससे विदेशी मंचों पर किए गए लेनदेन की जानकारी साझा करना आसान हो सकता है।
फिलहाल यह स्पष्ट है कि भारत की क्रिप्टो कर नीति को लेकर बहस अभी खत्म नहीं हुई है। एक ओर सरकार राजस्व और निगरानी को प्राथमिकता दे रही है, वहीं उद्योग का कहना है कि अत्यधिक कर बोझ नवाचार और कारोबार दोनों को प्रभावित कर रहा है। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संसद और नीति निर्माता इस बढ़ती चिंता पर क्या रुख अपनाते हैं।
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