
भारत में INR स्टेबलकॉइन की तैयारी, लेकिन IMF ने डॉलरकरण के जोखिम पर चेताया
भारत में रुपये आधारित स्टेबलकॉइन की चर्चा तेज है। इससे सीमा पार भुगतान आसान हो सकते हैं, लेकिन IMF के अनुसार डॉलर आधारित स्टेबलकॉइन तक आसान पहुंच से रुपये पर दबाव और डॉलरकरण का जोखिम बढ़ सकता है।

भारत में डिजिटल परिसंपत्तियों को लेकर बहस के बीच रुपये से जुड़े स्टेबलकॉइन की संभावना पर चर्चा तेज हो गई है। ऐसा टोकन रुपये के मूल्य से जुड़ा होगा और इसे ब्लॉकचेन नेटवर्क पर डिजिटल रूप में इस्तेमाल किया जा सकेगा। इससे सीमा पार भुगतान और डिजिटल लेनदेन आसान और सस्ता होने की उम्मीद है।
लेकिन इसके साथ एक नया जोखिम भी सामने आया है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी IMF की चिंताओं के मुताबिक, यदि रुपये आधारित स्टेबलकॉइन को उन्हीं ब्लॉकचेन नेटवर्क पर उपलब्ध कराया जाता है जहां अमेरिकी डॉलर से जुड़े USDT और USDC जैसे टोकन मौजूद हैं, तो भारतीय उपयोगकर्ताओं के लिए रुपये से डॉलर आधारित डिजिटल परिसंपत्तियों में जाना आसान हो सकता है। इससे लंबे समय में डॉलरकरण का जोखिम बढ़ सकता है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े क्रिप्टो उपयोगकर्ता बाजारों में शामिल है। ऐसे में रुपये आधारित डिजिटल मुद्रा की शुरुआत का असर केवल क्रिप्टो बाजार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भुगतान व्यवस्था, विदेशी मुद्रा प्रबंधन और मौद्रिक नीति पर भी पड़ सकता है।
INR स्टेबलकॉइन कैसे काम करेगा?
स्टेबलकॉइन ऐसी डिजिटल परिसंपत्ति है जिसकी कीमत किसी पारंपरिक मुद्रा या अन्य परिसंपत्ति से जोड़कर स्थिर रखने की कोशिश की जाती है। प्रस्तावित INR स्टेबलकॉइन का मूल्य रुपये के आसपास बनाए रखने का उद्देश्य होगा। इसे निजी संस्था जारी कर सकती है, जबकि भारत का डिजिटल रुपया RBI द्वारा जारी केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा है। दोनों को एक जैसा नहीं माना जा सकता।
यदि रुपये आधारित स्टेबलकॉइन ब्लॉकचेन पर उपलब्ध होता है, तो उपयोगकर्ता इसे डिजिटल भुगतान, लेनदेन और संभावित रूप से सीमा पार धन भेजने में इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे पारंपरिक बैंकिंग व्यवस्था के मुकाबले कुछ प्रक्रियाएं तेज हो सकती हैं।
इसका एक बड़ा फायदा विदेशों से आने वाले धन और अंतरराष्ट्रीय भुगतान में हो सकता है। भारत दुनिया में सबसे अधिक प्रेषण प्राप्त करने वाले देशों में है। स्टेबलकॉइन के जरिए ऐसे लेनदेन की लागत कम करने की संभावना जताई जा रही है।
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डॉलर आधारित टोकन तक बढ़ सकती है पहुंच
यहीं से सबसे बड़ी चिंता शुरू होती है। यदि INR स्टेबलकॉइन और डॉलर आधारित स्टेबलकॉइन एक ही ब्लॉकचेन पर उपलब्ध हों, तो उपयोगकर्ता एक टोकन से दूसरे टोकन में अपेक्षाकृत आसानी से बदलाव कर सकते हैं।
मसलन, कोई व्यक्ति पहले रुपये से जुड़े डिजिटल टोकन में धन रख सकता है और बाद में उसे USDT या USDC जैसे डॉलर आधारित टोकन में बदल सकता है। इससे डॉलर को डिजिटल वॉलेट में रखना पारंपरिक विदेशी मुद्रा प्रक्रिया की तुलना में आसान हो सकता है।
IMF ने इसी संभावना को उभरते बाजारों के लिए डॉलरकरण के जोखिम से जोड़ा है। यदि लोग स्थानीय मुद्रा के बजाय बड़ी मात्रा में डॉलर आधारित डिजिटल परिसंपत्तियां रखने लगते हैं, तो स्थानीय मुद्रा की मांग और वित्तीय नीति पर असर पड़ सकता है।
भारत के लिए यह चिंता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में पहले से ही बड़ी संख्या में क्रिप्टो उपयोगकर्ता मौजूद हैं।
RBI के सामने होगी बड़ी चुनौती
रुपये आधारित स्टेबलकॉइन की संभावित शुरुआत से RBI के सामने निगरानी की नई चुनौती पैदा हो सकती है। पारंपरिक बैंकिंग व्यवस्था में रुपये और विदेशी मुद्रा के प्रवाह पर निगरानी के लिए स्पष्ट प्रक्रियाएं मौजूद हैं। लेकिन ब्लॉकचेन पर उपयोगकर्ता सीधे अलग-अलग डिजिटल परिसंपत्तियों के बीच बदलाव कर सकते हैं।
यदि ऐसे लेनदेन तेजी से बढ़ते हैं, तो धन के प्रवाह, विदेशी मुद्रा की मांग और उपयोगकर्ताओं की वास्तविक गतिविधियों पर नजर रखना अधिक जटिल हो सकता है।
यही वजह है कि भारत में स्टेबलकॉइन को लेकर नियामकीय रुख अब भी सतर्क है। RBI पहले भी निजी क्रिप्टो परिसंपत्तियों और स्टेबलकॉइन से जुड़े जोखिमों पर चिंता जताता रहा है। केंद्रीय बैंक डिजिटल रुपये को अधिक नियंत्रित और सुरक्षित विकल्प के रूप में देखता है।
क्या भारत INR स्टेबलकॉइन के लिए तैयार है?
भारत में रुपये आधारित स्टेबलकॉइन को लेकर निजी क्षेत्र की ओर से रुचि दिखाई गई है। Polygon और Anq जैसी कंपनियों ने 2026 में INR से जुड़े डिजिटल टोकन की दिशा में योजनाओं की जानकारी दी थी। हालांकि ऐसे किसी टोकन को व्यापक स्तर पर लागू करने के लिए नियामकीय मंजूरी और स्पष्ट नियम जरूरी होंगे।
आने वाले समय में सरकार के सामने दोहरी चुनौती होगी। एक तरफ उसे तेज और कम लागत वाले डिजिटल भुगतान की संभावनाओं का फायदा उठाना होगा, वहीं दूसरी तरफ रुपये की स्थिरता, विदेशी मुद्रा नियंत्रण और वित्तीय निगरानी को भी सुरक्षित रखना होगा।
फिलहाल INR स्टेबलकॉइन कोई तय सरकारी योजना नहीं है, लेकिन इसकी चर्चा भारत के डिजिटल वित्त क्षेत्र में तेजी से बढ़ रही है। यदि इसे मंजूरी मिलती है, तो यह सीमा पार भुगतान को बदल सकता है। लेकिन इसके साथ डॉलर आधारित डिजिटल परिसंपत्तियों तक आसान पहुंच का जोखिम भी जुड़ा रहेगा। इसलिए भारत के लिए असली सवाल केवल यह नहीं होगा कि रुपये का स्टेबलकॉइन बनाया जाए या नहीं, बल्कि यह होगा कि उसे किस तरह के नियमों और निगरानी व्यवस्था के तहत चलाया जाए।
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