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Rajeev Ranjan Roy द्वारा लिखितstaff writerPratik Bhuyan द्वारा समीक्षितstaff editor

RBI का बड़ा प्रस्ताव: ब्रिक्स देशों की डिजिटल मुद्राओं को एक दूसरे से जोड़कर व्यापार और पर्यटन को सरल बनाना

ताजा खबरेंप्रकाशितJan 20, 2026

भारतीय रिज़र्व बैंक ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों की केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्राओं को जोड़ने का प्रस्ताव रखा है, जिससे सीमा-पार व्यापार और डॉलर पर निर्भरता में कमी की संभावनाएँ सशक्त होंगी।

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भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने ब्रिक्स (BRICS) देशों - ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका - की आधिकारिक डिजिटल मुद्राओं को आपस में जोड़ने का एक महत्वाकांक्षी प्रस्ताव तैयार किया है। यह प्रस्ताव 2026 में भारत द्वारा आयोजित होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में पेश करने की सिफारिश के साथ सामने आया है।

केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा

केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (CBDC) एक ऐसा डिजिटल रूप है जो किसी देश की सरकार द्वारा जारी और नियंत्रित होता है। यह पारंपरिक मुद्रा का डिजिटलीकरण है, जिससे भुगतान प्रणाली तेज, सुरक्षित और अधिक पारदर्शी बनती है। भारत ने दिसंबर 2022 में अपनी डिजिटल मुद्रा ई-रुपया जारी की, जिसे अब तक लगभग सात मिलियन उपयोगकर्ताओं ने अपनाया है।

आरबीआई का यह प्रस्ताव ब्रिक्स देशों की अंतरराष्ट्रीय आर्थिक साझेदारी को और मजबूत करने की दिशा में एक रणनीतिक कदम है। अगर इस प्रस्ताव को स्वीकार किया जाता है, तो सदस्य देशों की डिजिटल मुद्राओं के बीच सीधा लिंक बनाया जाएगा, जिससे सीमा-पार व्यापार और पर्यटन से जुड़ी भुगतान प्रक्रिया सरल और तेज़ होगी। इससे अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को भी धीरे-धीरे कम करने की दिशा में बल मिलेगा।

तकनीकी और नीति-निर्माण के क्षेत्र में प्रगति

ब्रिक्स के अग्रणी देशों ने अब तक अपनी डिजिटल मुद्राओं के पूर्ण परिचालन के लिए सिर्फ़ पायलट प्रोग्राम ही चलाए हैं, लेकिन तकनीकी और नीति-निर्माण के क्षेत्र में प्रगति जारी है। भारत, चीन और अन्य सदस्य देश डिजिटल मुद्रा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक स्वीकार्यता देने के लिए प्रयास कर रहे हैं।

इस प्रस्ताव के सामने आने का एक बड़ा कारण यह भी है कि वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में अमेरिकी डॉलर का प्रभुत्व अब चुनौती के सामना कर रहा है। ब्रिक्स देशों के बीच मुद्रा लिंक से डॉलर के उपयोग में कमी आ सकती है और सदस्य देशों को अपने व्यापार के लिए स्थानीय और साझा डिजिटल मुद्रा का उपयोग बढ़ाने का अवसर मिल सकता है।

चुनौतियाँ

हालाँकि, इस योजना के सामने कई चुनौतियाँ भी हैं। जैसे कि अलग-अलग देशों की तकनीकी प्रणालियों के बीच संगतता, डिजिटल मुद्रा संचालन के नियमों पर सहमति, और व्यापार असंतुलन की स्थिति में मुद्रा विनिमय व्यवस्था का प्रबंधन। इस दिशा में चर्चा जारी है और संभवतः केंद्रीय बैंकों के बीच दोतरफा मुद्रा विनिमय जैसे उपायों पर भी विचार हो रहा है।

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ब्रिक्स देशों के साथ डिजिटल मुद्रा के लिंक से जुड़े कदम का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बड़ा प्रभाव पड़ सकता है। इससे वैश्विक भुगतान प्रणाली में विविधता आएगी और कई देशों की मुद्रा नीति में स्वतंत्रता की भावना बढ़ेगी। यह संभव है कि इस तरह की पहल से आर्थिक शक्ति संतुलन में बदलाव आए और वैश्विक वित्तीय ढांचे में बहुध्रुवीयता को बल मिले।

भारत

भारत ने पहले भी अपनी डिजिटल मुद्रा को और अधिक सुलभ बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं। उदाहरण के लिए ई-रुपया के अंतर्गत ऑफ़लाइन भुगतान की सुविधा, सरकारी सब्सिडी के लिए प्रोग्राम करने योग्य डिजिटल भुगतान और फिनटेक कंपनियों के लिए वॉलेट इंटरफेस की अनुमति जैसी पहलें शामिल हैं।

इस वैश्विक प्रस्ताव के पीछे एक रणनीतिक सोच यह भी है कि भविष्य में विश्व वित्तीय व्यवस्था में परिवर्तन आएगा जहाँ एक से अधिक मजबूत मुद्राएँ आपस में जुड़कर अंतरराष्ट्रीय व्यापार को सुविधाजनक तथा कम जोखिमपूर्ण बनाएँगी। यह कदम व्यापारियों, पर्यटन उद्योग और वित्तीय संस्थाओं के लिए नई संभावनाएँ खोल सकता है।

निष्कर्ष

आरबीआई का ब्रिक्स डिजिटल मुद्राओं को जोड़ने का प्रस्ताव एक दूरदर्शी और रणनीतिक कदम है, जो न केवल व्यापार और पर्यटन से जुड़े भुगतान को सरल बनाएगा बल्कि वैश्विक मुद्रा प्रणाली में विविधता और स्वतंत्रता को भी बढ़ावा देगा।

हालांकि तकनीकी और नीति-निर्माण संबंधी चुनौतियाँ हैं, इससे सदस्य देशों के बीच आर्थिक साझेदारी और वित्तीय सहयोग को सशक्त करने में मदद मिलेगी। इस पहल से वैश्विक वित्तीय ढांचे में बहुध्रुवीयता और स्थानीय मुद्राओं की भूमिका को नई दिशा मिल सकती है।

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