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Jai Singla द्वारा लिखित ⁠, Staff Editor.Pratik Bhuyan द्वारा समीक्षित ⁠, Staff Editor.

भारतीय रुपया क्यों गिर रहा है और इसका बिटकॉइन पर क्या असर पड़ रहा है?

बाजारप्रकाशितMay 29, 2026

भारतीय रुपया 2026 में रिकॉर्ड कमजोरी पर पहुंच गया है। जानिए गिरते रुपये, महंगे डॉलर और बढ़ती महंगाई के बीच क्यों बिटकॉइन और स्टेबलकॉइन की तरफ बढ़ रहा है भारतीय निवेशकों का रुझान।

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भारत में 2026 के दौरान भारतीय रुपये पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। डॉलर के मुकाबले रुपया अपने इतिहास के सबसे कमजोर स्तरों में पहुंच चुका है। इसका असर सिर्फ विदेशी व्यापार या महंगाई तक सीमित नहीं है, बल्कि अब इसका प्रभाव क्रिप्टो बाजार और बिटकॉइन निवेश पर भी साफ दिखाई देने लगा है।

हाल के महीनों में सोशल मीडिया और crypto community में रुपये की कमजोरी को लेकर चर्चा तेज हुई है। कई crypto analysts का कहना है कि गिरता रुपया अब भारतीय निवेशकों को बिटकॉइन और dollar-backed स्टेबलकॉइन की तरफ धकेल रहा है।

रिकॉर्ड कमजोरी पर पहुंचा रुपया

साल 2026 की शुरुआत में भारतीय रुपया करीब 89.9 प्रति डॉलर के आसपास कारोबार कर रहा था। लेकिन मई तक यह गिरकर लगभग 95.8 प्रति डॉलर तक पहुंच गया। यानी सिर्फ पांच महीनों में रुपये में 6% से ज्यादा की कमजोरी दर्ज हुई।

विशेषज्ञों के मुताबिक पिछले दो दशकों में रुपया लगातार कमजोर हुआ है। कुछ रिपोर्ट्स का दावा है कि 2007 के बाद से भारतीय मुद्रा अपनी करीब 60% वैल्यू खो चुकी है।

इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह वैश्विक आर्थिक दबाव, तेल की बढ़ती कीमतें और विदेशी निवेशकों का पैसा निकालना बताया जा रहा है।

कच्चे तेल ने बढ़ाई मुश्किल

भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है और इसका भुगतान डॉलर में किया जाता है। 2026 में मध्य पूर्व तनाव और Iran-Israel संघर्ष के कारण Brent crude oil की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गईं।

जब तेल महंगा होता है, तब भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव बढ़ जाता है।

विश्लेषकों का अनुमान है कि तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी भारत के आयात बिल में करीब 15 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ डाल सकती है।

विदेशी निवेशकों ने निकाला पैसा

रुपये की कमजोरी के पीछे एक बड़ा कारण विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी है। 2026 में विदेशी portfolio investors ने भारतीय शेयर बाजार से अरबों डॉलर निकाले हैं।

जब विदेशी निवेशक भारतीय assets बेचते हैं, तो वे रुपये को डॉलर में बदलकर पैसा बाहर ले जाते हैं। इससे डॉलर की मांग और बढ़ जाती है और रुपया और कमजोर होता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक ऐसा चक्र बन जाता है जहां कमजोर रुपया और ज्यादा निवेश निकासी को बढ़ावा देता है।

डॉलर की मजबूती भी बनी वजह

अमेरिकी Federal Reserve ने ब्याज दरें ऊंचे स्तर पर बनाए रखी हैं। इससे डॉलर लगातार मजबूत बना हुआ है। आमतौर पर मजबूत डॉलर का असर सभी emerging market currencies पर पड़ता है, लेकिन भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर इसका असर ज्यादा दिखाई देता है।

2026 में कई एशियाई मुद्राएं स्थिर हुईं, लेकिन भारतीय रुपया लगातार कमजोर बना रहा। इसी वजह से analysts अब इसे एशिया की सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली बड़ी मुद्रा बता रहे हैं।

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बिटकॉइन और स्टेबलकॉइन की तरफ बढ़ रहा रुझान

रुपये की कमजोरी का असर अब क्रिप्टो बाजार में भी देखने को मिल रहा है। जब रुपया गिरता है, तब बिटकॉइन की कीमत भारतीय रुपये में और तेजी से बढ़ती दिखाई देती है।

उदाहरण के लिए अगर बिटकॉइन की डॉलर कीमत स्थिर भी रहे, तब भी रुपये की कमजोरी के कारण भारतीय निवेशकों को INR terms में फायदा दिख सकता है।

यही वजह है कि कई निवेशक अब बिटकॉइन को सिर्फ speculative asset नहीं, बल्कि currency depreciation hedge के रूप में देखने लगे हैं।

इसके अलावा USDT जैसे dollar-pegged स्टेबलकॉइन की मांग भी बढ़ रही है। कई users के लिए स्टेबलकॉइन रखना लगभग डॉलर रखने जैसा माना जा रहा है।

क्रिप्टो अपनाने में दिख रही तेजी

विशेषज्ञों का अनुमान है कि emerging markets में currency pressure के कारण 2026 में क्रिप्टो अपनाने में करीब 25% तक की बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।

भारत में कई exchanges ने BTC-INR trading pairs को बढ़ावा देना शुरू कर दिया है ताकि users सीधे रुपये से बिटकॉइन खरीद सकें।

हालांकि regulatory uncertainty और भारी taxation अब भी बड़ी चुनौती बने हुए हैं।

भारी टैक्स से निवेशक परेशान

भारत में crypto gains पर अभी भी 30% flat tax लागू है। इसके अलावा हर transaction पर 1% TDS भी काटा जाता है।

कई analysts का कहना है कि गिरते रुपये के दौर में यह टैक्स और भारी महसूस होता है। वजह यह है कि कई बार investors को रुपये में ज्यादा profit दिखाई देता है, जबकि असली फायदा सिर्फ currency depreciation की वजह से होता है।

Crypto industry लंबे समय से टैक्स नियमों में राहत और clearer policy framework की मांग कर रही है।

क्या संभल सकता है रुपया?

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तेल की कीमतें कम होती हैं, विदेशी निवेश दोबारा लौटता है और geopolitical tensions घटते हैं, तो रुपये को कुछ राहत मिल सकती है।

लेकिन अगर तेल महंगा बना रहता है और विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी रहती है, तो रुपये पर दबाव लंबे समय तक बना रह सकता है।

फिलहाल इतना जरूर साफ है कि रुपये की गिरावट अब सिर्फ forex बाजार की कहानी नहीं रह गई है। यह तेजी से बिटकॉइन और क्रिप्टो अपनाने की कहानी भी बनती जा रही है, खासकर उन भारतीय निवेशकों के लिए जो अपनी purchasing power बचाने का रास्ता तलाश रहे हैं।

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यह लेख Cointelegraph की Editorial Policy के अनुसार तैयार किया गया है और केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। यह निवेश सलाह या अनुशंसाएं नहीं है। सभी निवेश और व्यापार में जोखिम होता है; पाठकों को स्वतंत्र शोध करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

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